हम हो गए कंगाल

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 आजादी  का शतक  न बीता, हम हो गए कंगाल ।
 अहिंसा  से आजादी  छीनी,  नहीं बिछाया  जाल ।
 ईमान ख़रीदा,अस्मत लूटी, खुद  धरती  के लाल ।
 षड़यंत्र, फरेब से ओहदा पाया, देखो इनका कमाल ।
 उनका क्या जो शहीद हो गए,  तस्वीरों में गुलाल ।
 शहीदों पर नतमस्तक होकर,  बदली  अपनी चाल ।
 सत्ता के गलियारे में पहुंचे, खादी  बन  गई ढाल ।
 समाज पर  सितम  ढाते हैं,  बांका  हो  न बाल ।

विजय कुमार सिंह

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