बदरा तू उमड़-घुमड़ चहुँ ओर से अइहो

अबकी न  तरसइहो,  बरस-बरस जइहो,
बदरा तू उमड़-घुमड़ चहुँ ओर से अइहो ।

तोहरे कारण फटी-फटी छाती है मइया की,
सूखी  अंतड़ियां हैं सारे  कृषक  भइया की,
पेड़ों से  झड़  गए पत्ते पिछले सावन  में,
कंटीली  चुभन लगे अब  तो पुरवइया की,
पशु  मरे,  बच्चे मरे भूख और प्यास  से,
बाकी बचे आस लिए  अब भी खेवइया की,
ऐसे  न  बरसइहो  कि  बहा के ले जइहो,
परिवार, घर-द्वार बरसने के सवइया की ।

बदरा  तू  उमड़-घुमड़ चहुँ ओर से अइहो,
अबकी  न  तरसइहो, बरस-बरस  जइहो,
लूट-लूट  ले  जाते जल माँ के जिगरा से,
माई  के  मरला के बाद छाती न पटइहो,
खेत-खलिहान  सब हरियाली से झूमैं-गावैं,
जाते-जाते  ई बात की  पुष्टि कर जइहो,
नदियन की प्यास बुझा,  जल भर जइहो,
अबकी  न  सूखे-सूखे  बिन बरसे जइहो ।

बदरा  तू  उमड़-घुमड़ चहुँ ओर से अइहो,
अबकी  न  तरसइहो, बरस-बरस जइहो ।

विजय कुमार सिंह

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