पत्थर

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ठोकर लगी तो व्यक्ति ने राह में पड़े पत्थर से पूछा – बीच में क्यों पड़े हो किनारे क्यों नहीं चले जाते ?

पत्थर – आपकी कितनी आँखें हैं ?
व्यक्ति – दो ।

पत्थर – मेरी कितनी आँखें हैं ?
व्यक्ति – पत्थरों को आँखें नहीं होतीं ।

पत्थर – आप आँख होकर भी नहीं देख रहे हैं और मुझ नेत्रहीन से देखने की उम्मीद लगा रहे हैं ।
व्यक्ति – अच्छा किनारे पर चले जाओ ।

पत्थर – आपकी कितनी टांगें हैं ?
व्यक्ति – समझ गया ।

व्यक्ति ने पत्थर को उठाकर किनारे कर दिया ।
पत्थर – देखो तुम इंसानों की ठोकरें खा-खाकर मेरी हड्डियां चूर-चूर हो गयी हैं और मेरा शरीर गोल-मटोल हो गया है ।
अब जरा सी भी ठोकर लगाती है तो मैं दूर तक लुढ़कता रहता हूँ और मेरा पूरा शरीर छिल जाता है ।
इंसान कितना कठोर है ।

व्यक्ति – कठोर तो तुम हो, तुम्हारा शरीर ही पत्थर से बना है ।
पत्थर – मैं तो मोम से भी ज्यादा मुलायम हूँ । मैं तो अपने शत्रुओं के प्रति भी नरम रहता हूँ ।

व्यक्ति – तुम्हारी जरा सी ठोकर से कोई भी लहूलुहान हो जाता है ।
पत्थर – ठोकर तो व्यक्ति ही मुझे मारता है और प्रतिक्रिया स्वरुप वह लहूलुहान होता है ।
मैं तो ठोकर खाकर भी एक इंच भी उसकी तरफ नहीं बढ़ता हूँ अपितु मैं तो पीछे ही हटता हूँ
अपने भार और इंसानी ठोकर के अनुपात में ।

व्यक्ति – तुम कुछ भी कहो हो तो तुम पत्थर ही ।
पत्थर – भाई अच्छा थोड़ी मदद और कर दो । किसी पेड़ की छाँव में रख दो धूप में पड़े-पड़े झुलस गया हूँ ।

व्यक्ति – लो मैंने तुम्हे पेड़ की छाँव में भी कर दिया अब तो ठीक है न ।
पत्थर – भाई जब इतनी मदद की है तो एक मदद और कर दो, बहुत प्यासा हूँ थोड़ा जल पिला दो ।

व्यक्ति – लो मैं जल ले आया बताओ कैसे पिलाऊँ ।
पत्थर – बस तुम मेरे ऊपर गिरते जाओ मैं पी लूंगा ।

व्यक्ति – लो मैंने सारा जल तुम्हारे ऊपर गिर दिया, तुम्हारी प्यास बुझी या नहीं ।
पत्थर – मेरी प्यास बुझ गयी और इसके लिए तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद.
तुम बताओ तुम कहाँ जा रहे हो ?

व्यक्ति – मेरे बच्चे की तबियत ख़राब है दवा के लिए मालिक से पैसे माँगा नहीं मिला
अब उसी की जुगाड़ में जा रहा हूँ । बिना पैसे दवा कैसे लाऊँ ?
पत्थर – तुम आँखें बंद कर कुछ क्षण विश्राम कर लो तबतक मैं कुछ उपाय सोचता हूँ ।

व्यक्ति को आँखें बंद कर पेड़ की छाँव में पड़े पत्थर की ओर मुखातिब देखकर धीरे-धीरे बहुत लोग
जुटने लगे और चढ़ावा चढाने लगे । व्यक्ति ने सबको नमन की मुद्रा में देखा । उसके मस्तिष्क
का ताला खुल गया । वह भी नमन की मुद्रा मैं बैठ गया । कुछ समय बाद जब लोग चले गए
तो पत्थर ने कहा यह सारा चढ़ावा ले जाओ और अपने बच्चे की दवा ले आओ ।

व्यक्ति – मैंने आपको पहचानने में भूल की । मुझे माफ़ कर दीजिये ।

जय भोले नाथ की । जय शिव शंकर ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com
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