प्यार के किस्से

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दो आँखों से दिखी नहीं, दो आँखें  और चढ़ा लीं,
बुढ़ापे  की  लाठी ने  जवानी  की  दौड़ लगा ली,
जैसे खबर मिली  दिल धक-धक, धक-धक दौड़ा,
याद  आ गयी  पुरानी बातें  फिर रुक गया थोड़ा, 
निकल पड़ी  तांगे  पर  तुम मैं  पीछे-पीछे दौड़ा,
याद करो  वो बीते दिन  जब अपनी  हड्डी तोड़ा,
बेतहाशा  दौड़  लगाई, चाह  में  थी तुम समाई,
गड्ढे में जब  पाँव पड़ा तो  नानी-दादी याद आई,
तुम भी दादी-नानी  बन गई  और मैं दादा-नाना, 
प्यार फिर  भी बना रहा, अलग  हो गया  घराना,
हमारे प्यार  की बातें  सुन बच्चे मंद-मंद मुस्काते,
बीच में  अपने प्यार के  कुछ किस्से  हमे सुनाते,
किस्से बनते-बनते  रह  गए  ऐसे  अपने किस्से,
कभी तेरे-मेरे बीच के थे, अब बच्चों के हैं हिस्से ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com
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