खयालों, ख्वाबों में…

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👉दिनांक : २१/११/२०२०
👉दिन : शनिवार
👉विधा : गजल
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खयालों, ख्वाबों में अभी मैं जिंदा हूँ ।
जमाना मानता नहीं, शर्मिंदा हूँ ।
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यकीं, जज्बा लिए लड़ा हूँ तूफाँ से
नेकी की शोहबत निभाई, निंदा हूँ ।
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मेरी, उड़ने की कोशिशें नाकामी थीं
कहूँ क्या, आदमी नहीं, परिंदा हूँ ।
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लोग कहते मैं सिरफिरा हूँ, बस यूँ ही
यकीनन, आज तो नहीं, आइंदा हूँ ।
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मिटी पहचान चौखटों पर मतलब के
शहर में आपके ही मैं बाशिंदा हूँ ।
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कहाँ ये आरजू जुदा होती खुद से
मैं तो इंसानियत का ही कारिंदा हूँ ।
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जरूरत क्या है नाज करते वो हमपर
सभी की चाह में “विजय”, चुनिंदा हूँ ।
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
👉@सर्वाधिकार सुरक्षित

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