दिल लगाना….

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👉दिनांक : २७/१२/२०२०
👉दिन : रविवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 2122 2122 2122 2122
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अब कहाँ हैं दिल की बातें क्या किसी से दिल लगाना ।
दिल जहाँ टूटा पड़ा हो फिर वहाँ क्या दिल लगाना ।
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एक आईना समझ तोड़ा किसी ने दिल कभी तो
है नहीं वो प्यार सच्चा क्या वहाँ फिर दिल लगाना ।
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यार यारी को निभाते देखकर हित साधना को
हैं कहाँ वो यार सच्चे उनसे फिर क्यों दिल लगाना ।
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हो जहाँ चौपड़ बिछी जो खेल नित शह-मात का हो
लूटने की नीतियाँ हैं फिर वहाँ क्या दिल लगाना ।
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रिश्ते नाते बिक रहे हो जब सरे बाजार में यूँ
फर्ज को अपने निभाना और थोड़ा दिल लगाना ।
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रेशमी बाजार में ढूंढा किये जो दिल कभी तो
रोज सजते रोज बिकते फिर वहाँ क्या दिल लगाना ।
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जिंदगी में यार मेरे दिल लगाना हो “विजय” तो
दिल से सुन ले दिल की बातें बस वहीं पर दिल लगाना ।
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
👉@सर्वाधिकार सुरक्षित

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