कोई प्यासा किनारों में…

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👉दिनांक : ०७/०२/२०२१
👉दिन : रविवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 1222 1222 1222 1222
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【१】
नहीं दिखती कोई रौनक जहां के इन नजारों में ।
कोई सागर को पी जाता कोई प्यासा किनारों में ।
【२】
दिलों से जो जुड़े थे कल वो रिश्ते कर रहे घायल
कोई तन्हा जिया करता कोई रहता हजारों में ।
【३】
जुदाई में जिसे ढूंढा नहीं पाया यहां उसको
पता क्या था वही इक दिन बसेगा जा सितारों में ।
【४】
जुबां से बात कम होती चली है रीत अब ऐसी
जहाँ मतलब का जीवन है सभी बातें इशारों में ।
【५】
लिखी रब ने इबारत जो उसे झूठा बना डाला
“विजय” जो धन का मालिक वो खरीदे सब बजारों में ।
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
👉@सर्वाधिकार सुरक्षित

3 thoughts on “कोई प्यासा किनारों में…

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