छिपा बैठा सितारों में…

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👉दिनांक : ०७/०३/२०२१
👉दिन : रविवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 1222 1222 1222 1222
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【१】
कहाँ वो देखता है अब, छिपा बैठा सितारों में ।
नहीं रौनक दिलों में अब, नहीं रौनक नजारों में ।
【२】
किसी से कुछ नहीं कहता, कहा कोई नहीं सुनता
पता होता उसे ये कौन सिमटा था दिवारों में ।
【३】
बहुत ही तेज है तूफां, शमा दिल की बुझी सी है
सभी सिमटे हुए बैठे, अपने-अपने किनारों में ।
【४】
कहाँ कोई सुना था शोर सन्नाटों में गूँजा था
वो पत्थरदिल न पिघले दर्द सुनकर भी पुकारों में ।
【५】
जमाने के ठगे थे जो कहाँ वो दर्द भूले थे
पलक पर छाये थे शबनम बिना बारिश बहारों में ।
【६】
निगाहें नूर की प्यासी, शिखर ख्वाहिश बनी चाहत
हुए है दौड़ में शामिल, दिखा जो भी हजारों में ।
【७】
किताबों में नहीं बसते, कभी थे ज्ञान के सागर
लुटी सीरत के मालिक हैं, “विजय” मिलते बजारों में ।
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
👉@सर्वाधिकार सुरक्षित

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