आँसू…..

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👉दिनांक : २९/०४/२०२१
👉दिन : गुरुवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 1222 1222 1222 1222
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【1】
कहीं सूखे कहीं ठहरे कहीं बहते दिखे ऑंसू
हुआ मंजर यहाँ ऐसा घटा बनकर टिके आँसू ।
【2】
कहीं अपनों कहीं गैरों की पीड़ा ने किया घायल
मगर अवसर इसे समझा नहीं उनमें बचे आँसू ।
【3】
न जाने क्यों बुझे से हैं अनेकों दिल के दीपक भी
बने शायद कोई पत्थर नहीं उन आँख में आँसू ।
【4】
दिलों को घर बना दुश्मन सफर पर भेजता यूँ ही
वहाँ होते नहीं आँसू यहाँ छिपते नहीं आँसू ।
【5】
हुई बर्बाद ये जन्नत सदी है ये तबाही की
खड़े हैं द्वार करके बंद रब थामे हुए आँसू ।
【6】
न भूलेंगे कभी ये दिन न भूलेंगी कभी रातें
मिलेंगे जब कभी यारों बहेंगे आँख से आँसू ।
【7】
हवा की बात क्या करना “विजय” साँसें सितमगर हैं
गमों की इस हवेली में अलग किरदार में आँसू ।
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
👉@सर्वाधिकार सुरक्षित

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