….मुझे पहचान दे देना

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👉दिनांक : २३/०५/२०२१
👉दिन : रविवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 1222 1222 1222 1222
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【1】
रहा हूँ अजनबी बनकर, कोई पहचान दे देना ।
लगे जो न्याय संगत तो, मुझे भी मान दे देना ।
【2】
कई किरदार जीता हूँ, पलों की चाहतें लेकर
लगे प्यारा कभी कोई, उसे सम्मान दे देना ।
【3】
दिलों को छू लिया हो जो, सृजन प्यारा वही होता
अगर भावों में बह जाना, दिली मुस्कान दे देना ।
【4】
गगन को चूमना चाहे, ये पंक्षी है उड़ानों का
जमीं पर जब उतर आये, तो दिल अनजान दे देना ।
【5】
मुहब्बत को ही सौंपा था, घरौंदा प्यारे से दिल का
जतन जिसने नहीं जाना, मेरा सामान दे देना ।
【6】
वफ़ा की बात करना जब, निभाना रीत इंसानी
मेरे यारों गले लगकर, वो इक रमजान दे देना ।
【7】
चला है सिलसिला ऐसा, दिलों में पल रही नफरत
मुहब्बत की कोई मूरत, सजाकर जान दे देना ।
【8】
अगर कुर्बानियाँ देकर, रहे इंसानियत जिंदा
खुशी से खुद गले लगकर, “विजय” बलिदान दे देना ।
【9】
लुटी ख्वाहिश से जीता हो, जमाने में अगर कोई
“विजय” कोशिश यही करना, उसे अरमान दे देना ।
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
👉@सर्वाधिकार सुरक्षित

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