आँखें…

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👉दिनांक : ३०/०५/२०२१
👉दिन : रविवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 1222 1222 1222 1222
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【1】
हुए मदहोश कितने देख कजराई हुई ऑंखें ।
लुटा दिल जब मिली नजरें तो शरमाई हुई ऑंखें ।
【2】
हुआ तकरार प्रीतम से, बनीं नाजुक कली सी वो
मनाने पर ही मानेंगी, ये रुसवाई हुई ऑंखें ।
【3】
खफा होकर नजर फेरें, दिखी जब बेवफाई तो
कहाँ फिर बात बनती है, जो हरजाई हुई ऑंखें ।
【4】
घटा सावन की घिरती जब, छमा छम-छम बजे घुँघरू
हकीकत सा नशेमन ख्वाब अलसाई हुई ऑंखें ।
【5】
जफ़ा की राह जब चलतीं, किसी के दिल के टुकड़े कर
नजर के सामने होकर भी कतराई हुई ऑंखें ।
【6】
मुहब्बत ने किया घायल, नहीं कुछ दिल को भाता है
न हँसती हैं न रोती हैं, ये नजराई हुई ऑंखें ।
【7】
खिलौना प्यार में टूटा, वफ़ा की राह पर चलकर
बही हैं फिर सुनामी बन, ये दरियाई हुई ऑंखें ।
【8】
कभी था पास जो अपने, गँवाया वक़्त ने उसको
बना सागर गमों का दिल, तो दुखदाई हुई ऑंखें ।
【9】
तलाशा उम्रभर जिनको, मिले जब आखिरी साँसें
“विजय” पिघलीं शिखर हिम् सी, ये धुँधलाई हुई ऑंखें ।
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
👉@सर्वाधिकार सुरक्षित

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