पत्थर दिल

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भोर

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–दोहा–
चकोर देखे चाँद को, मैं देखूं उस ओर I
न जाने कब निशा गयी, रवि दर्शन को भोर II
–विजय कुमार सिंह–

बेकारी (दोहा)

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बेकारी (दोहा)
सपने लेकर घूमते, हाथ में डिग्री थाम |
इधर-उधर बौरा रहे, मिले नहीं पर काम ||
विजय कुमार सिंह

 

 

 

 

 

हाइवे

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–दोहा–
रेस का खेल हाइवे, भागमभागी होय |
एक लड़े लड़ती चले, अनहोनी बड़ होय ||
–विजय कुमार सिंह–

फ़ोन

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–दोहा–
ढांप कान फिरते रहे, थाम हाथ में फ़ोन |
राहों पर ऐसे चलें, हो असुरक्षित जोन ||
–विजय कुमार सिंह–

भोजन

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–दोहा–
चौमिन मोमो खा गए, फ्रूटी माज़ा भाय |
भोजन सेहतमंद जो, लड़कन नहीं सुहाय ||
–विजय कुमार सिंह–