रौनक

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तन्हाई

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सामने जिंदगी खड़ी थी

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सम्बन्ध

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Sambandh

पहचान आजकल की अनजान सी लगती है
उलझी हानि-लाभ के दरम्यान सी लगती है
हित सधने पर नित नए सम्बन्ध बन जाते
अहमियत इंसान की आज पान सी लगती है.

विजय कुमार सिंह

इन्तजार

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चमन ने बहार से पूछा कब तलक आओगी
तय वक़्त गुजर गया अब कितना सताओगी
उम्र गुजरी जन्म गुजरे गुजरगयी ख्वाहिशें
गर्द तलाश रही है क्या अपना पता बताओगी.

विजय कुमार सिंह