होली-होली

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💐होली की हार्दिक शुभकामनाएं💐

👉दिनांक : २१-०३-२०१९
👉दिन : गुरुवार
👉विषय : होली
👉विधा : मुक्त छंद
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
प्रीत की रीत निभा लूँ सखा
द्वेष भूल तुझे रंग डालूँ
मधुर-मधुर पकवान खिलाकर
ठंडाई, तनिक भंग डालूँ ।

बैरी मनवा द्वेष लिए है
घात-प्रतिघात क्लेश लिए है
भूलकर सारे अंतर्द्वंद
हिय की उलझन को सुलझा लूँ
द्वेष भूल तुझे रंग डालूँ ।

बचपन की सुधियाँ हैं अच्छी
प्रीत वही थी अपनी सच्ची
संग-संग मिल जीना सीखा
यौवन आते नव पथ दीखा
जंग छिड़ी आपस में ऐसी
स्वार्थ भरा सुध किसकी कैसी
हिय के सारे शूल निकालूँ
द्वेष भूल तुझे रंग डालूँ ।

एक-दूजे संग मिल जीना
बाँट-बाँट जीवन विष पीना
कुछ तो ऐसा हम कर जायें
गीत हमारे सब मिल गायें
भूल हमारी क्षमा चाहती
खोल बाँह मैं गले लगा लूँ
द्वेष भूल तुझे रंग डालूँ ।

वर्षों से कुछ शेष पड़ा है
हिय जाने क्यों दंभ अड़ा है
गिरि चाहे जितना ऊँचा हो
आसमान चाहे नीचा हो
शिखर दंभ भी झुक जाता है
नभ के आगे रुक जाता है
कलुषित मन को मैं समझा लूँ
द्वेष भूल तुझे रंग डालूँ ।

लाल-हरे, नीले-पीले सब
रंग सुहाने मधुरम बोली
कलुषित अंतस आज धुलें हम
द्वार खोल हिय, खेलें होली
सुधियों को फिर सच कर डालूँ
द्वेष भूल तुझे रंग डालूँ ।

प्रीत की रीत निभा लूँ सखा
द्वेष भूल तुझे रंग डालूँ
मधुर-मधुर पकवान खिलाकर
ठंडाई, तनिक भंग डालूँ ।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

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होली

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💐होली की हार्दिक शुभकामनाएं💐

👉दिनांक : १९-०३-२०१९
👉दिन : मंगलवार
👉विषय : होली
👉विधा : दोहा
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
सखी, सखी-री, ओ सखी, फागुन मास हुलास ।
आगंतुक बन द्वार पर, खड़ा हुआ मधुमास ।।
💐
सखी, सखी-री, सुन सखी, आज चढ़ा ली भंग,।
भूली-भटकी कर गयी, पिया संग हुडदंग ।।
💐
हुई बावली देखकर, आया फागुन मास ।
चंचल चितवन कर गयी, साजन का उपहास ।।
💐
चली सुनामी गागरी, सतरंगी चितचोर ।
छोड़ घूँघटा लाज का, फागुन मारे जोर ।।
💐
प्रीतम के भुजपाश में, कैद बनी हिय अंक ।
लजवंती सिमटी रही, बिच्छू मारे डंक ।।
💐
निर्मल-कोमल गात पर, श्यामल प्रीतम रंग ।
भींगी चुनरी काँपती, प्रेम सुधा भर अंग ।।
💐
अंग-अंग भर रंग में, कटि कैदी भुज नाथ ।
अधर मंजरी भ्रमरमय, प्रेम पथिक प्रिय साथ ।।
💐
अंतस पिया निहारते, आज नहीं उपवास ।
प्रीतम हिय द्वारे खड़ा, फागुन में मधुमास ।।
💐
हृदय मिलन बिन तो सखी, रंग सभी हैं व्यर्थ ।
साजन बिन फागुन कहाँ, क्या रंगों का अर्थ ।।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

कारवाँ

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👉दिनांक : १९-०२-२०१९
👉दिन : मंगलवार
👉विधा : दोहा
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गुजर रहा है कारवाँ, लिपट तिरंगा देख |
सिसक रही हैं आँधियाँ, हिय करता उल्लेख ||
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सहमा-सहमा वक़्त है, सिमटा लेकर ज्वार |
आनेवाला है अभी, पूनम का त्यौहार ||
💐
देख सुनामी मौन है, जलधि शशि इन्तजार |
बदलेगा अब रंग ये, गूँज रहा है थार ||
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

आतंक (समसामयिक)

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👉दिनांक : १८-०२-२०१९
👉दिन : सोमवार
👉विषय : आतंक (समसामयिक)
👉विधा : गजल
👉बहर : २१२ २१२ २१२ २१२
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दायरा ये संयम का हटा दीजिये |
दौर आतंक का अब मिटा दीजिये |
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राग हमसे सजा गीत हो गैर का,
पाठ उनको वफ़ा का रटा दीजिये |
💐
देश छलिया बने जो उबलते रहें,
बर्फ की चादरों पर पटा दीजिये |
💐
जो न चाहे सुधरना कभी बात से,
जेल से उनके घर को सटा दीजिये |
💐
ये नियंत्रण रेखा रहे ही नहीं,
ले जमीं मामला निपटा दीजिये |
💐
जो पड़ोसी सुधरना नहीं चाहता,
नाप सरहद का उसके घटा दीजिये |
💐
जो बगावत की बातें करे अब यहाँ,
स्वाद मिर्ची का उनको चटा दीजिये |
💐
प्रेम हो जो पड़ोसी से ज्यादा कहीं,
द्वार कुंडी “विजय” खटखटा दीजिये |
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

आतंक

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👉दिनांक : १५-०२-२०१९
👉दिन : शुक्रवार
👉विषय : आतंक
👉विधा : मुक्त छंद
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दृग मेघ जमकर बरस रहे हैं
हिय की सरिता उमड़ रही है |
💐
ये वेदना अब सही न जाती
छल से कबतक बुझेगी बाती
कबतक मौन अमावस होगा
उनका हिय नहीं पावस होगा
छलिया नित-नित पनप रहे हैं
दृग मेघ जमकर बरस रहे हैं |
💐
यूँ मिटने को नहीं थे आये
सपने थे जो मन में सजाये
लहू से माँ की चुनर सजाएँ
शत्रू से उनकी लाज बचाएँ
सीमा पर लड़ते जान जाती
फिर जीवन की बुझती बाती
साँप आस्तीन में बस रहे हैं
दृग मेघ जमकर बरस रहे हैं |
💐
गौरव थे वो माटी के अपने
टूट गए उनके सब सपने
दीपक की लौ अब बुझी पड़ी
कैसी विपदा की है ये घड़ी
जन्मदायी बेहाल फूटती
वामांगी भी श्रृंगार लूटती
बूढ़ा बरगद मुक्ति को आतुर
लौटा दे कोई उसका वो सुर
खिलें कैसे कलियों पर ग्रहण
खुशियों का आजीवन हरण
आजादी पाकर सिसक रहे हैं
दृग मेघ जमकर बरस रहे हैं |
💐
दृग मेघ जमकर बरस रहे हैं
हिय की सरिता उमड़ रही है |
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

माँ सरस्वती वंदना

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👉दिनांक : १०-०२-२०१९
👉दिन : रविवार
👉विषय : माँ सरस्वती वंदना
👉विधा : मनहरण घनाक्षरी
👉मापनी : २१२१२१२१, २१२१२१२१, २१२१२१२१, २१२१२१२
(वर्ण 8,8,8,7)
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
ज्ञान बुद्धि दायिनी, माँ सुनें करूँ पुकार,
भूल को मेरी सुधार, ज्ञान का प्रकाश दें ।
कोशिशें करूँ सदैव, दूर हो हरेक भूल,
ज्ञान के अनेक रत्न, माँ इसे तराश दें |
💐
हे रमा, परा, त्रिमूर्ति, माँ निरंजना निखार,
दोष, ध्यान अन्धकार, मालिनी निकाल दें |
कष्ट राह के अनेक, जागता रहे विवेक,
चेतना करें विकास, राह कष्ट टाल दें ।
💐
ज्ञान का प्रवाह आप, दूर हों सभी संताप,
आपसे मिले प्रकाश, ज्ञान को निखार दें |
जिंदगी रहे अशांत, जो न हो प्रकाश ज्ञान,
राह ज्ञान की सदैव, आप ही सँवार दें ।
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

तकदीर

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👉दिनांक : २३-१२-२०१८ (पूर्व प्रकाशित FB पर)
👉दिन : रविवार
👉विधा : दोहा गजल
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लगकर वो दीवार से, बहा रहा है नीर |
आँसू से तक़दीर की, मिटा रहा है पीर |
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लोग तमाशा देखते, बचकर चलता राह,
रात अँधेरी देखकर, घूमा बने फ़क़ीर |
💐
दीपक सारे जल चुके, राख पड़ा दिल शेष,
बुझी हुई हैं ख्वाहिशें, खींचा करे लकीर |
💐
बेकरार भी अब नहीं, करता न इंतजार,
खुद सुलगाई आग में, जला रहा तकसीर |
💐
होता इलाज जख्म का, रोग ‘विजय’ गंभीर,
दिल में जब नासूर हो, कौन करे तदबीर |
💐
#तकसीर=भूल, तदबीर=उपाय
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित