दर्द अपने दिल का….

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👉दिनांक : ०७-१२-२०१८
👉दिन : शुक्रवार
👉विधा : गजल
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👉वह्र : २१२२ १२१२ २२
दर्द अपने दिल का जता पाता |
काश ! कोई गजल का पता पाता |
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मैं तो सीता रहा हूँ जख्मों को,
काश ! ये राज मैं बता पाता |
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रिश्तों के छल ने छलनी बहुत किया,
काश ! इसमें अपनी खता पाता |
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दोस्त मतलब के लिए ही रहे,
काश ! कुछ पल हसीं बिता पाता |
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रूठकर यूँ सताते वो चल गए,
काश ! फिर कोई यूँ सता पाता |
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चाहतें तो कभी भी रुकती नहीं,
उनको पाने में विवशता पाता |
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जब भी आँसू बहे गम में ‘विजय’,
इस ज़माने को मैं हँसता पाता |

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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉9661773044
💐💐💐💐💐💐💐💐💐
@सर्वाधिकार सुरक्षित

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समाज का मौन

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👉दिनांक : ०५-१२-२०१८
👉दिन : बुधवार
👉विधा : मुक्त छंद
👉विषय : समाज का मौन
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मौन हूँ मौनी अमावस के समाज पर
मौन हूँ लोगों के दिल में दफ़न राज पर |
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प्रयास तो यही था की लोग समझेंगे
कुछ सुनेंगे मेरी कुछ अपनी कहेंगे
अपराध पर मौन, अपराधी को लुभाया
सुनना और कहना किसी को न भाया
निःशब्द हूँ मैं खुद अपने अल्फाज पर
मौन हूँ मौनी अमावस के समाज पर |
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नैतिकता ने अपनी परिभाषा बदल ली
जिस राह आयी थी वापस निकल ली
जिन्हें कोसती थी वो परिधान हो गए
जो समस्या थे वही समाधान हो गए
सुरहीन हूँ छिड़े नए सुरों के साज पर
मौन हूँ मौनी अमावस के समाज पर |
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परदे उठानेवाले अब खामोश हो गए
जो परदे में रहते थे मदहोश हो गए
आजादी के जश्न को अब बढ़ी तादाद है
शहीदों को माल्यार्पण कर घर आबाद है
आहत हूँ आजादी से मिले ऐसे ताज पर
मौन हूँ मौनी अमावस के समाज पर |
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जज्बा ख़ुद्दारी का रेत सा बिखर गया
चापलूसी का दौर अब आगे निकल गया
प्रतिभा को पलायन की विवशता ने घेरा
शातिरों का तंत्र पर पड़ गया है डेरा
क्षुब्ध हूँ पनपे इस नए रिवाज पर
मौन हूँ मौनी अमावस के समाज पर |
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धर्म आस्था का खिलौना बन गया
मानवता से आगे होकर के तन गया
ज्ञान पुस्तक व पद का श्रृंगार हो गए
ग्रहण करनेवालों का अहंकार हो गए
संशित हूँ ज्ञान प्रकाश के आगाज पर
मौन हूँ मौनी अमावस के समाज पर |
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ताज उनके हाथों जो वंदन नहीं करते
मानवता के रुदन पर क्रंदन नहीं करते
माता की बोली लगाते बैठकर गोद में
छलनी करते सीना अपने आमोद में
बुत सा हूँ, सुत के ऐसे मिजाज पर
मौन हूँ मौनी अमावस के समाज पर |
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
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@सर्वाधिकार सुरक्षित

अभिलाषा

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👉दिनांक : २९/११/२०१८
👉दिन : गुरुवार
👉विधा : मुक्त छंद
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जब तुम करती श्रृंगार प्रिये
मेरा रोम-रोम तब खिल उठता
उर की बढ़ जाती चंचलता
हिय अंक की अभिलाषा करता |
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चंदा निहारता है तुमको
मंद पड़ जाती हैं चांदनी
मस्त पवन के झोंके आ
छेड़ा करते हैं रागिनी
उर की बढ़ जाती विव्हलता
हिय अंक की अभिलाषा करता |
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उड़ती चुनर बन हारुल सी
निज पंखों में आकाश लिए
मैं खड़ा धरा पर वृक्ष बना
आओगी तुम ये आस लिए
उर को अभिसार की व्याकुलता
हिय अंक की अभिलाषा करता |
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कानों में झुमके डोल रहे
बिंदिया संग हार का प्यार लिए
किस्मत का धनी है मंगलसूत्र
हिय का तेरे सब सार लिए
उर की बढ़ जाती विचलता
हिय अंक की अभिलाषा करता |
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तीखे नयना हैं कजरारे
नज़रों की तेज कटार लिए
अधरों की दोनों पंखुड़ियाँ
सुर्ख गुलाब सा निखार लिए
कदम स्वयं ही बढ़ जाता
हिय अंक की अभिलाषा करता |
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जब तुम करती श्रृंगार प्रिये
मेरा रोम-रोम तब खिल उठता
उर की बढ़ जाती चंचलता
हिय अंक की अभिलाषा करता |
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स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह

सर्वाधिकार सुरक्षित

माँ लक्ष्मी

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👉दिनांक : ०७/११/२०१८
👉दिन : बुधवार
👉विधा : मुक्त छंद
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Maa Lakshmi

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माँ लक्ष्मी आना, हर घर में आना
संग गणपति आना, वैभव ले आना
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दृग कितने टकटकी लगाये
जीवनभर की आस लिए
करबद्ध खड़े हैं दर्शन को
जीवन में वैभव प्यास लिए
उनके घर आना, वसुधारिणी आना
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करती हो जहाँ पर वास तुम
संकट सारे टल जाते हैं
दुःख, दारिद्र से मुक्ति मिलती
जब कदम तुम्हारे पड़ जाते हैं
उस घर में आना, दारिद्र्यनाशिनी आना
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इस युग में यह रीत बनी
सब तेरी चाह में फिरते हैं
आँखें मूंदे ही भाग रहे
औंधे मुंह गर्त में गिरते हैं
उनको समझाना, पद्मालया आना
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तुम बिन मिलता अब ज्ञान नहीं
तुम बिन सच का सम्मान नहीं
तुम बिन अब मिलता न्याय कहाँ
तुमसे ही जगमग होता ये जहाँ
वसुधा पर छाना, सुप्रसन्ना आना
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हे माँ स्वीकारो मेरी आराधना
बैठा निज भाव की थाल सजा
हरो कष्ट शेष जीवन के अब
जो जीवन में अबतक उपजा
मेरे घर आना, वरलक्ष्मी आना
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माँ लक्ष्मी आना, हर घर में आना
संग गणपति आना, वैभव ले आना
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह

दीपावली

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WordPress के सभी सदस्यों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं. आप सभी की दिवाली खुशियों से भरी हो और माता लक्ष्मी की सबपर कृपा बानी रहे. पटाखे छुड़ाते समय सावधानी अवश्य बरतें ताकि शुभता बरक़रार रहे.

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मंगलकामनाओं सहित
विजय कुमार सिंह

 

गीत

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👉दिनांक : २७/१०/२०१८
👉दिन : शनिवार
👉विधा : मुक्त छंद
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बड़ी थी चाह मुद्दत से
तुम मेरे गीत गा देना
सितारों से मैं देखूंगा
तुम सुर अपने सजा देना |

जो अक्षर बोल बिगड़े हों
वीणा के तार हिला जाना
जो शब्दों के हों भार अलग
भावों से उन्हें मिला जाना
तुम सुर अपने सजा देना
तुम मेरे गीत गा देना |

कुछ बिखरे से सपने होंगे
बेबस मिलन की आस लिए
बिन पलकों वाले दृग से
टकटकी लगाए प्यास लिए
तुम उनकों थोड़ा बहला देना
तुम मेरे गीत गा देना |

उखड़ी साँसों के निशां होंगे
इन्तजार को तरस रहे
उखड़ी चौखट के मकां होंगे
तूफानों में भटक रहे
तुम वजूद उनका मिटा देना
तुम मेरे गीत गा देना |

बड़ी थी चाह मुद्दत से
तुम मेरे गीत गा देना
सितारों से मैं देखूंगा
तुम सुर अपने सजा देना |
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👉स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह

Geetgadena