वक़्त

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दिनांक : ०७-०९-२०१८
दिन : शुक्रवार

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वक़्त की सहमी अदा ने
मुझको कितना तड़पाया
राह तो दी फूलों वाली
काँटों में जा उलझाया.

छीनकर ममता की थपकी
छोड़ आया ले जाकर धूल
चुभने को तो चुभ गए हैं
कौन छाँटे अब वो शूल
कहाँ रही वो छत्र-छाया
मुझको कितना तड़पाया.

लड़खड़ाते चल पड़े हम
खुद के जख्मों को छिपाकर
जो भी मुझको भा रहा था
गैरों में उसको गँवाकर
हिय भले ही पछताया
मुझको कितना तड़पाया.

कड़ियाँ भरोसे की बनाईं
लिए सफर का हार निकले
जिन्हें लगाया हिय अंक से
आस्तीन के हथियार निकले
चाहत में समायी सरमाया
मुझको कितना तड़पाया.

ये धरा भी पूछती है
लुट गए हम आखिर क्यों
ये गगन भी पूछता है
मिट गए हम आखिर क्यों
सबके सवालों ने रुलाया
मुझको कितना तड़पाया.

वक़्त की सहमी अदा ने
मुझको कितना तड़पाया
राह तो दी फूलों वाली
काँटों में जा उलझाया.

रचनाकार-
विजय कुमार सिंह
पटना, बिहार

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श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव

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सभी पाठकों को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव

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(१)
जन्म हुआ जब मात पिता पर संकट घेर खड़ा अति भारी |
बालक प्राण बचे जिससे हर युक्ति पिता करते तब सारी ||
खोल दिए तब बंधन द्वार रही मति खोकर सैन्य सवारी |
सूप लिए तब हाथ उठा बढ़ नंदन ग्राम घनी अँधियारी ||

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(२)
गोकुल ग्राम सजा जब केशव बाँसुरिया बजती अति प्यारी |
संग सखी सब ग्वालिन नर्तन, दर्श दिखा फिरते बनवारी ||
बाल सखा सब साथ मिले जब, माखन ढूँढ रहे गिरधारी |
टूट गयी जब गागर केशव खोज रहीं यशुदा महतारी ||

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(३)
चीर उतार चलें सखियाँ सब, स्नान करें सरि आकर नारी |
साँवरिया तब सीख दिए चल चीर उठाय कदम्ब अटारी ||
संग सखी सब ग्वालिन चाह, मिले परिधान हरें सब पीरें|
साँवरिया तब रास रचाकर, संग सखा चलते नद तीरे ||

विजय कुमार सिंह

रक्षाबंधन

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सभी पाठकों को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनायें.

—कुंडलियां छंद—

रेशम की डोरी बँधा, बहना का है प्यार |
रक्षाबंधन-सा नहीं, कोई भी त्यौहार ||
कोई भी त्यौहार, लगे जो प्यारा बंधन |
रहे बहन की लाज, तिलक माथे पर चन्दन ||
पवित्र इतनी डोर, धर्म हो जाते उपशम |
बँधा कलाई प्यार, बहन ने बाँधा रेशम ||

—विजय कुमार सिंह—

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जय शिव शंकर

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नोट : यह रचना एक पुराने गीत की धुन से प्रेरित है………..
“चलो रे डोली उठाओ कहार………….”

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चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
शिव की नगरी जाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

जिन नैनों में प्रेम की ज्योति, जिनकी कृपा से सृष्टि होती
गर्व नहीं हो कोई जोर नहीं हो, भक्ति सदा ही प्रेम से होती
जल्दी से बाबा धाम जाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

छाई है देखो हरियाली, आई है रुत सावन वाली
हर आशा पूरी करेंगे, जब मन से ध्यान धरेंगे
काँधे रख काँवर जाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

तन राह पे मन तेरी नगरिया, सर पे छायी काली बदरिया
दर्शन को चले हैं काँवरिया, प्यासी है भक्तों की नजरिया
अपने सपनों का सजाओ काँवर, भोला दर्शन की रुत आयी
चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

सजी बड़ी बाबा की हवेली, व्याकुल राह भी है नवेली
जिन संग नाचे जिन संग खेले, भक्तों की वो सखी सहेली
अब ना देरी लगाओं भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
शिव की नगरी जाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

विजय कुमार सिंह

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चंद्र ग्रहण

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धरती पीछे जा छिपा, चंदा छाया खोज |
छिप रवि किरणों से रहा, तपता है वह रोज ||
तपता है वह रोज, चाँदनी शीतल बिखरे |
उसका प्रकाश देख, चमक तारों में उभरे ||
चंदा सबका प्यार, सुहागिन पूजा करतीं |
ग्रहण लगा तो देख, अशांत रहती धरती ||
विजय कुमार सिंह

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भूख और मौत

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भूखी मरतीं बेटियाँ, भूखा मरे किसान |
सत्ता मेवे खा रही, बढ़ा बहुत अभिमान ||
बढ़ा बहुत अभिमान, नहीं चिंता है कोई |
महलों के हैं ठाठ, सदा जनता है रोई ||
ढकोसले की नीति, ह्रदय की नदिया सूखी |
भ्रष्ट हुए आचार, मरे यूँ जनता भूखी ||
विजय कुमार सिंह

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