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जय शिव शंकर

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नोट : यह रचना एक पुराने गीत की धुन से प्रेरित है………..
“चलो रे डोली उठाओ कहार………….”

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चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
शिव की नगरी जाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

जिन नैनों में प्रेम की ज्योति, जिनकी कृपा से सृष्टि होती
गर्व नहीं हो कोई जोर नहीं हो, भक्ति सदा ही प्रेम से होती
जल्दी से बाबा धाम जाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

छाई है देखो हरियाली, आई है रुत सावन वाली
हर आशा पूरी करेंगे, जब मन से ध्यान धरेंगे
काँधे रख काँवर जाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

तन राह पे मन तेरी नगरिया, सर पे छायी काली बदरिया
दर्शन को चले हैं काँवरिया, प्यासी है भक्तों की नजरिया
अपने सपनों का सजाओ काँवर, भोला दर्शन की रुत आयी
चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

सजी बड़ी बाबा की हवेली, व्याकुल राह भी है नवेली
जिन संग नाचे जिन संग खेले, भक्तों की वो सखी सहेली
अब ना देरी लगाओं भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
चलो रे काँवर उठाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी
शिव की नगरी जाओ भक्तों, भोला दर्शन की रुत आयी

विजय कुमार सिंह

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चंद्र ग्रहण

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धरती पीछे जा छिपा, चंदा छाया खोज |
छिप रवि किरणों से रहा, तपता है वह रोज ||
तपता है वह रोज, चाँदनी शीतल बिखरे |
उसका प्रकाश देख, चमक तारों में उभरे ||
चंदा सबका प्यार, सुहागिन पूजा करतीं |
ग्रहण लगा तो देख, अशांत रहती धरती ||
विजय कुमार सिंह

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भूख और मौत

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भूखी मरतीं बेटियाँ, भूखा मरे किसान |
सत्ता मेवे खा रही, बढ़ा बहुत अभिमान ||
बढ़ा बहुत अभिमान, नहीं चिंता है कोई |
महलों के हैं ठाठ, सदा जनता है रोई ||
ढकोसले की नीति, ह्रदय की नदिया सूखी |
भ्रष्ट हुए आचार, मरे यूँ जनता भूखी ||
विजय कुमार सिंह

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पत्नी

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जब जब खनकें चूड़ियाँ, कहतीं अपनी बात |
या  तो  रोटी  खाइये,  या   बेलन  सौगात ||
या  बेलन  सौगात,    देख   लें   पत्नी  तेवर |
पारा   बढ़ता   देख,   भागते  ननदी  देवर ||
कोपभवन   में   कैद, बंद  हो  दाना भी अब |
भजिये प्रभु को बैठ,  रूठती पत्नी जब जब ||

विजय कुमार सिंह

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