महा मानव

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👉दिनांक : १४-०६-२०१९
👉दिन : शुक्रवार
👉विधा : मुक्त छंद
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उस सपने से जुड़कर चलिए, जो महा मानव ने देखा है ।
सजते हैं जिस देश की खातिर, भारत की सीमा रेखा है ।
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विश्व पटल पर छाया तब से, जबसे उनके सर ताज हुआ,
बिखरे-बिखरे से सपनों का, शनैः शनैः फिर से साज हुआ,
स्वर्ण चिरैया देश बने फिर, यह स्वप्न अभी अनदेखा है,
उस सपने से जुड़कर चलिए, जो महा मानव ने देखा है ।
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सबकुछ उनपर नहीं छोड़िए, फर्ज ध्यान खुद का भी रखिये,
हाथ जुड़े जब साथ-साथ तब, स्वाद नया निशदिन तब चखिए,
विश्व शिखर पर हम ही होंगे, इतिहासों में भी लेखा है,
उस सपने से जुड़कर चलिए, जो महा मानव ने देखा है ।
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लोभ देखकर जुड़े हुए जो, ज्ञान का घूँट उन्हें पिला दें,
कलुषित अंतस का शृंगार कर, सुधरे समाज राह दिला दें,
चमचमाये भारत भूमि फिर, सीमा खिंची स्वर्ण रेखा है,
उस सपने से जुड़कर चलिए, जो महा मानव ने देखा है ।
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चुन लेना तुम उन सपनों को, जो देशप्रेम में सजते हों,
गीत भले ही हो तुम्हारा, पर धुन सबकी वो बजते हों,
संस्कार गुणों से भरे हों, खुद की ही लक्ष्मण रेखा है,
उस सपने से जुड़कर चलिए, जो महा मानव ने देखा है ।
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है प्रधान की गरिमा अपनी, विश्व पटल रखे ये ध्यान,
अपशब्दों से धूमिल होता, संग उनके देश का मान,
रखें विश्वास जो स्वार्थ रहित, खुद बनाई कर्म रेखा है,
उस सपने से जुड़कर चलिए, जो महा मानव ने देखा है ।
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उस सपने से जुड़कर चलिए, जो महा मानव ने देखा है ।
सजते हैं जिस देश की खातिर, भारत की सीमा रेखा है ।
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

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जिंदगी

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👉दिनांक : ०३-०६-२०१९
👉दिन : सोमवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 2122 2122 212
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जिंदगी में जिंदगी की है पड़ी ।
और ये तो जिंदगी खुद पर अड़ी ।
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चाहतें उसको सदा थामे रहीं,
और ये तो बन गयी यूँ हथकड़ी ।
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हौंसला जो मिल गया उड़ती रही,
जो गिरे टूटी हुई हो हर कड़ी ।
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गम खुशी के साथ में है जिंदगी,
एक माला फूल की कोमल लड़ी ।
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यूँ “विजय” जब साथ हो प्यारा कभी,
हो बड़ी ही खूबसूरत हर घड़ी ।
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

बस इक दुआ ही आसमानी चाहिए…

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👉दिनांक : २९-०५-२०१९
👉दिन : बुधवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 2212 2212 2212
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बस इक दुआ ही आसमानी चाहिए |
अब संग तेरे जिंदगानी चाहिए |

ठहरे कदम क्यों हैं हमारे सामने,
हो साथ तो मंजिल बनानी चाहिए |

काँटों का क्या वो तो चुभेंगे चाह पर,
हर इक कली उनको दिवानी चाहिए |

हो गुफ्तगू ये है जरुरी संग में,
राहें वफ़ा तो आजमानी चाहिए |

मेरे खुदा तू ही बता मैं क्या करूँ,
जो तू नहीं तेरी निशानी चाहिए |

वादा किया तो साथ चलकर देखिये,
बस एक रेखा जाफरानी चाहिए |

इन गेसुओं को अपनी मर्जी की पड़ी,
सजने की खातिर रातरानी चाहिए |

सच में कभी थीं खूबसूरत वादियाँ,
फिर से वफ़ा इनको सिखानी चाहिए |

मिलकर “विजय” हम-तुम उड़ें आकाश में,
इन प्रीत पंखों को रवानी चाहिए |
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

ओढ़ चादर चाँदनी की …

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👉दिनांक : २५-०५-२०१९
👉दिन : शनिवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 2122 2122 2122
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ओढ़ चादर चाँदनी की ताकते हैं ।
फाड़कर आँखों को अपने झाँकते हैं ।

गिनते तारे रात सारी बीत जाती,
गिनतियों का ज्ञान अपना आँकते हैं ।

कौन कहता है अँधेरा नींद का है,
आसमानी ओढ़नी खुद ढाँकते हैं ।।

गौर करिये बेखबर हैं खौफ से हम,
जख्म अपने खुद पड़े हम टाँकते हैं ।

प्रीत अपनी जानकर मैंने कहा है,
चाँद की है चाँदनी सब हाँकते हैं ।

भोर की सूरत दिखी तब जानिए हम,
रात को कदमों से अपने डाँकते हैं ।

बाँह फैला रातभर माँगी दुआएँ,
पर “विजय” उम्मीद को हम फाँकते हैं ।
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

अजनबी

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👉दिनांक : २४-०५-२०१९
👉दिन : शुक्रवार
👉विधा : गजल
👉बह्र : 2122 2122 2122
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जिंदगी में लोग सारे अजनबी हैं ।
जो हुई पहचान तो दिल में वही हैं ।

द्वार खोले जब खड़ी है रोशनी तो,
संग में परछाइयाँ क्योंकर अड़ी हैं ।

अब उदर को भूख सहना आ गया है,
मौत आये तो यहाँ किसको पड़ी है ।

आरजू को पंख पर उड़ना सिखा दें,
हौंसले के चाँद को छूना सही है ।

मौन हल देता नहीं कोई कभी भी,
बोलना वाजिब लगे तब अनकही है ।

हैं सितारों में बहुत से लोग अपने,
चाह तो अपनी पहुँचना भी वहीं है ।

जिसके कदमों पर जमाना झुक रहा अब
लूट पर उसकी निगाहें फिर टिकी हैं ।

और कितना रक्त को दूषित करेगा,
देख बाकी अब जवानी भी नहीं है ।

आजमाकर देखिए अपनी वफ़ा को,
हर शिकायत खुद “विजय” जानी यहीं है ।
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

महावीर जयंती

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👉दिनांक : १९-०४-२०१९
👉दिन : शुक्रवार
👉विधा : तंत्री छंद
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(1)
हे महावीर, बजरंगबली, वंदन मम, स्वीकार कीजिये |
संकट सारे, आप दूरकर, कष्ट हरें, उद्धार कीजिये |
शक्तिपुंज हो, ज्ञानी अनुपम, प्रिय रघुवर, बलशाली तुम हो |
याद दिलाएं, शक्ति तुम्हारी, नभ धरती, पाताली तुम हो |
(2)
बचपन में रवि, भक्ष लिया जब, भूख लगी, फल समझकर एक |
ग्रह बंधन हर, देव मुक्त कर, जग विपदा, टाली तब अनेक |
अष्टसिद्ध हो, गुरु ज्ञान मिला, सूर्यदेव, शिक्षा के दाता |
शिव सुत गणपति, रवि सुत शनि सम, मीत-प्रीत, के तुम हो धाता |
(3)
बाण लगा जब, लक्ष्मण अचेत, गिरि उखाड़, संजीवन लाये |
रावण डाला, नाग फांस जब, ला खगेश, बंधन कटवाये |
पूंछ जली तो, लंका जारी, चिन्ह दिए, सीता सुध लाये |
उड़कर सागर, पार किया तब, रघुवर को, भाई सम भाये |
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित

कह-मुकरियाँ

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👉दिनांक : १९-०४-२०१९
👉दिन : शुक्रवार
👉विधा : कह-मुकरियाँ
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(१)
दर्श देखकर शीतलता पाऊँ
नहीं दिखें तो मैं भरमाऊँ
उनके बिन है मन एक फंदा
क्या सखि साजन, न सखि चंदा ।
(२)
तन चमकता रहे सुनहला
जोड़ी बनी नहले पर दहला
हिय का मेरे छिपा है सार
क्या सखि साजन, न सखि हार ।
(३)
तन छू-छू जाए मन को लहराए
उर ले हिचकोले हिय को भाये
संग-संग घूमे बाहर, घर-आंगन
क्या सखि साजन, न सखि पवन ।
(४)
थाम के बहियाँ चूमा करते
संग-संग रहते घूमते-फिरते
उनके बिन फीका जीवन बंधन
क्या सखि साजन, न सखि कंगन ।
(५)
सुधियों को हर लेते हैं जब-तब
जीवन पर है अधिकार अजब
विरह दिए तब बोझिल हुये नैन
क्या सखि साजन, न सखि चैन ।
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👉पूर्णतः मौलिक, स्वरचित, स्वप्रमाणित
👉विजय कुमार सिंह
👉पटना, बिहार.
@सर्वाधिकार सुरक्षित